Gauridatta

Monday, November 28, 2016

भारत बंद एकदम हिट है !

२८ नवम्बर भारत बंद का असर इतना गहरा था की खुद भारत को भी पता न चला I😜Image result for indian politicsImage result for BHARAT BAND

 बात 'भारत बन्द' से शुरू हुई , और दो दिन में ही 'आक्रोश दिवस' में बदल गयी I विपक्छी दल बस नाम के रह गए हैं I नोटबंदी के मसले पर जनता कितनी तकलीफ़ में है, कितने ग़ुस्से में है, है भी या नहीं, 'भारत बन्द' के साथ आएगी या नहीं, और विपक्ष देश के कितने हिस्सों में 'बन्द' करा पाने की हैसियत रखता है, कहाँ उसकी इतनी ताक़त है? इन सभी प्रश्नों का उत्तर हमें कल के हुए भारत बंद की इस्थिति से जाहिर हो गया है I

विपकछी दल को ये एहसास था भी या नही की लोग उसकेसाथ खड़े हैं या मोदी जी के साथ ? सायद नही ! बस यो ही हवा में तीर चला दिए ,लगे तो लगे नही तो खट्टीI ये है भारत की राजनितिक  इस्थिति, कोई विपक्छी दल ही नही है I


बिहार में नीतीश कुमार बिदक गये, वह तो काफ़ी दिनों से ऐसे सिग्नल दे ही रहे थे. उधर बंगाल में ममता दीदी क्यों लेफ़्ट की हड़ताल का हिस्सा बनें और कर्नाटक, उत्तराखंड और हिमाचल में पहले से ही दुर्दिन की आशंकाओं से ग्रस्त काँग्रेस क्यों 'बन्द' के ग़ुब्बारे के फुस्स हो जाने का एक और ठीकरा अपने सिर फोड़े.
यूपी में मुलायम-माया एक पाले में आ ही नहीं सकते. इन राज्यों में नहीं, तो बाक़ी और कहाँ 'बन्द' हो सकता था? कहीं नहीं IImage result for नितीश

तो ऐसा विपक्ष है ही कहाँ, जो 'भारत बन्द' करा सकने का माद्दा रखता हो, जो केन्द्र की किसी नीति के ख़िलाफ़ पूरे देश में सड़कों पर लड़ सकता हो? विपक्ष के नाम पर हमारे पास जो कुछ है, वह बस रंग-बिरंगी चूड़ियाँ है, जो ज़्यादा से ज़्यादा बस एक काम कर सकता हI संसद में खनक सकता है और उसकी कार्रवाई ठप्प करा सकता है, कुछ बिल अटका सकता है. पिछले ढाई बरसों में यह काम उसने बख़ूबी किया है. इससे ज़्यादा की न उसकी औक़ात है और न उससे उम्मीद की जानी चाहिए IImage result for BHARAT BAND

 हमारे पास आधा विपक्ष है. यानी विपक्ष है भी और नहीं भी ! विपक्ष राज्यों में है, लेकिन देश में नहीं है! क्षेत्रीय दल हैं,  जो अपने-अपने राज्यों में चुनावी लड़ाइयाँ जीत सकते हैं या किसी और तथाकथित राष्ट्रीय दल को राज्य में घुसने से या बड़ी ताक़त बनने से रोक सकते हैंI
इनकी राजनीति शुरू भी चुनावी समीकरणों से होती है और ख़त्म भी उसी पर होती हैI इनकी  राजनीति के खूँटे भी अलग होते हैं, कहीं जाति, कहीं क्षेत्रीय अस्मिता, कहीं माटी-मानुस, कहीं क़द्दावर नेता और कहीं किसी 'क्रान्ति' की आस बतर्ज़ अरविन्द केजरीवालI


समस्या यही है! राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का कोई विकल्प हमारे पास नहीं है. ले-दे कर काँग्रेस और लेफ़्ट. दोनों ही  घिसट रही हैं किसी तरह. देश के नक़्शे से लगातार उखड़ती-सिमटती हुई. दोनों ही विरासत से अभिशप्त.
लेफ़्ट तो ख़ैर बदलनेवाला नहीं, लेकिन चौदह की हार से भी अविचलित रही काँग्रेस सचमुच आज भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा अजूबा साबित हो रही हैI
केवल भारत ही नही बल्कि पुरे विश्व में तेजी से राजनितिक हालत बदल रही हैं I. भारत में 2014 में नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक जीत, ब्रेक्ज़िट और अमरीका में डोनाल्ड ट्रम्प को सिंहासन मिलना, इन तीनों लक्ष्यों को कैसे पाया गया, क्या इनके तरीक़ों में एक पैटर्न नहीं दिखता?


अपने कौशल से मोदी जी ने नोटबंदी जैसे मुद्दे पर हुई सरकार की तमाम विफलताओं को 'राष्ट्रहित'  और लोगों को 'देश के लिए त्याग' करने के लिए 'कंडीशंड' कर दियाIImage result for मोदी
उधर काँग्रेस के ख़िलाफ़ 'परसेप्शन युद्ध' कैसे लड़ा गया. काँग्रेस पहले तो 'मुस्लिम तुष्टिकरण' करनेवाली 'हिन्दू-विरोधी' सेकुलर पार्टी बनायी गई, फिर वह 'ऐतिहासिक भ्रष्टाचार की प्रतीक' बनाई गई और अब वह 'राष्ट्रहित की विरोधी' के तौर पर लीपी जा रही है. बदले में काँग्रेस ने क्या किया. कुछ नहीं. आक्रमण करना तो छोड़िए, अपने बचाव के लिए भी कुछ नहीं कर सका I
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मूल मुद्दा एक है. कोई राष्ट्रीय विपक्ष दल  है नहीं और जो विपक्ष है,उसके नेता का अता पता मुझे मालूम नही I  कुछ क्षेत्रीय दल हैं, जो राजनीती समझने के लिए भी एक दुसरे का मुह तकते हैं I
राष्ट्रीय राजनीति में तो विपक्ष के नाम पर ऐसा सन्नाटा है जैसे की  सत्रुधन सिन्हा की फिल्मों में उनके खामोश कहने पर हो जाया करती थी I जब तक काँग्रेस अपनी जड़ता नहीं तोड़ती, नई राजनीति के अनुरूप ख़ुद को नहीं ढालती, तब तक देश में न कोई राष्ट्रीय विपक्ष उभर सकता है और न ही विपक्ष को कोई नेतृत्व मिल सकता है. तब तक मोदी जी जो कहें, वही सही!

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